खैरागढ़. राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कैंपस-2 प्रेक्षागृह में नाट्य विभाग के विद्यार्थियों ने नाटक ‘बरदईहा—एक प्रेम कहानी’ का प्रभावशाली मंचन कर गांव की सामाजिक व्यवस्था, जातिगत भेदभाव और प्रेम के संघर्ष की मार्मिक कहानी प्रस्तुत की। नाटक ने सदियों पुराने उस सवाल को मंच पर जीवंत कर दिया कि क्या प्रेम आज भी जाति और सामाजिक हैसियत की दीवारों के सामने हार जाता है।

निर्देशक डॉ. शिशु कुमार सिंह और लेखक दीपक कुमार साहू ने कहानी को ऐसे गांव की पृष्ठभूमि में बुना, जहां गौटिया की मौजूदगी में मजदूरी के बदले खड़ी धान तय होती है और सामाजिक पदानुक्रम लोगों के रिश्तों तक को नियंत्रित करता है। इसी व्यवस्था के बीच गौटिया की पढ़ी-लिखी बेटी सुखिया (आकाशी मेश्राम) और अनपढ़ बरदईहा मंगलु (खगेश पैकरा) के बीच पनपने वाला प्रेम सामाजिक और वर्गीय भेदभाव के खिलाफ मौन विद्रोह का रूप लेता है।

मंगलु और सुखिया के रिश्ते की जानकारी गौटिया के बेटे खोरबहरा (काव्य त्रिमले) को होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा और इज्जत बचाने के नाम पर मंगलु को गांव से बेदखल कर दिया जाता है। इसके बावजूद दिवाली पर सोहाई बांधने की परंपरा के लिए गुरू (रूपेश तेंडुलकर) उसे वापस गांव बुलाता है। यहीं से कहानी एक ऐसे त्रासद मोड़ पर पहुंचती है, जो दर्शकों को भीतर तक झकझोर देता है।
रिश्ते की सच्चाई सामने आने के बाद खोरबहरा ग्रामीणों के साथ मिलकर मंगलु की हत्या कर देता है। इसके बाद सुखिया का यह खुलासा कि उसने केवल मंगलु को ही नहीं, बल्कि उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को भी खो दिया है, नाटक को बेहद मार्मिक और सवाल खड़े करने वाले अंत तक पहुंचाता है।

नाटक में पिता जी (देव सिंह), माता जी (वंदिता शुक्ला), गौटिया कैलास (समीर चंद्र साहू) और गौटनिन (सिजी सिरमौर) की भूमिकाओं ने कथानक को और सघनता प्रदान की। कोरस में दीपक साहू, हर्षित डेहरिया, आनंद वैष्णल, ओमेंद्र कावडे, चिकू, आकाश चंद्रवंशी, दीपाली और दीक्षा बघेल की सामूहिक प्रस्तुति सराहनीय रही।
नाटक की प्रस्तुति को छत्तीसगढ़ी लोकजीवन से जोड़ने में संगीत की अहम भूमिका रही। मातर, गौरी-गौरा और लोकगीतों के माध्यम से संगीत निर्देशक हर्ष चंद्राकर ने ग्रामीण परिवेश को जीवंत किया। तबले-गुदुम पर वेद प्रकाश रावटे, हारमोनियम-मोहरी पर करन तारम, बैंजो पर उजित निषाद, बांसुरी पर सौरभ और दफड़ा पर कामेश साहू ने संगत दी। मंच सजावट की जिम्मेदारी हर्ष चंद्राकर और पुनेश ध्रुव ने संभाली।
नाटक के मंचन के दौरान विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा, प्रोफेसर राजन यादव, डॉ. मानस साहू और डॉ. दीपशिखा पटेल सहित अन्य उपस्थित रहे। प्रस्तुति ने मनोरंजन के साथ-साथ ग्रामीण समाज में मौजूद सामाजिक असमानताओं और मानवीय रिश्तों पर गंभीर सवाल भी दर्शकों के सामने रखे।


