खैरागढ़. इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग और कुलपति महोदया प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा के संरक्षण में पुरालिपि एवं पुरालेख अध्ययन विषय पर आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ सोमवार, 16 फरवरी को संपन्न हुआ।
दीप प्रज्वलन के साथ हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम का आरंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। मुख्य अतिथि कुलपति महोदया प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा, कार्यशाला निर्देशक प्रो. (डॉ.) राजन यादव, विषय विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर (भूतपूर्व निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मैसूर), प्रभारी कुलसचिव श्री वेंकट रमन गुड़े और संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे उपस्थित थे।
कार्यशाला का उद्देश्य और स्वरूप
कार्यशाला संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे ने स्वागत भाषण में इसका उद्देश्य स्पष्ट किया। उन्होंने इराक, मेसोपोटामिया और भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं का उदाहरण देते हुए बताया कि इतिहास और अतीत की समझ वर्तमान समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विभिन्न विषयों के विद्यार्थियों को प्राचीन अभिलेखों के माध्यम से ऐतिहासिक ज्ञान से परिचित कराना और उनकी सांस्कृतिक जड़ों की समझ विकसित करना है।
कुलपति का उद्बोधन

कुलपति महोदया प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध प्रदेश है। उन्होंने विद्यार्थियों को विशेषज्ञों के व्याख्यान से लाभान्वित होने और अपनी संस्कृति एवं इतिहास को गहराई से जानने के लिए प्रेरित किया। अपने हालिया सिरपुर दौरे का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रदेश की ऐतिहासिक संपदा पर प्रकाश डाला।
विशेषज्ञों ने दी महत्वपूर्ण जानकारी
विषय विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर ने भारत की अभिलेखीय परंपरा और अभिलेखीय साक्षरता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्राचीन अभिलेख हमारी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित और समझा जाना आवश्यक है ताकि वे विस्मृति में न चले जाएँ। उन्होंने छत्तीसगढ़ को अभिलेखीय संपदा से परिपूर्ण बताते हुए इसकी सराहना की।
प्रेरक उद्बोधन और संचालन
अधिष्ठाता और कार्यशाला निर्देशक प्रो. (डॉ.) राजन यादव ने कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों का सस्वर पाठ करते हुए कहा कि इतिहास केवल अतीत की कथा नहीं बल्कि हमारी जड़ों और पहचान का आधार है। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. कौस्तुभ रंजन ने किया। उन्होंने इसे विद्यार्थियों के लिए ऐतिहासिक धरोहरों को समझने का सशक्त मंच बताया।
आभार प्रदर्शन
अंत में प्रभारी कुलसचिव श्री वेंकट आर. गुडे ने उपस्थित अतिथियों, विश्वविद्यालय प्रशासन, संकाय सदस्यों, आयोजकों, शिक्षकों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।




